‘स्त्री 2’ फिल्म में किसे बताया गया ‘सरकटा’… राजकुमार राव-श्रद्धा कपूर किसके प्रतीक?

स्त्री 2 में राजकुमार राव और श्रद्धा कपूर

डॉ. सुजाता मिश्रा

हाल ही प्रदर्शित फिल्म ‘स्त्री 2–सरकटे  का आतंक’ अपनी तरह की एक नायाब फिल्म है। साहित्य की विविध विद्याओं में हमनें अक्सर व्यंग्य शैली का प्रयोग होते देखा किन्तु किसी फिल्म की स्क्रिप्ट ऐसी लिख दी जाए कि देखने वाला हंसते –हंसते लोट –पोट हो जाए किंतु उसके दिमाग में, मन में कहीं अनेक विचार और तर्क भी उठने लगे! 

Sujata mishra
डॉ. सुजाता मिश्रा

फिल्म का शीर्षक ‘सरकटे का आतंक’ सुनने में लगता है कि किसी दैत्य या राक्षस के विषय में है किंतु इस शीर्षक में भी व्यंग्य है! सरकटा वो शख्स है जिसने पिछले जन्म में एक अय्याश किस्म, रूढ़िवादी मानसिकता वाला पुरुष था जिसने स्त्री और उसकी बेटी की हत्या की थी, क्योंकि स्त्री एक वैश्या थी और एक वैश्या द्वारा विवाह करके सामान्य जीवन जीना उसे मंजूर नहीं था! लेकिन मरने के बाद चुड़ैल बन चुकी स्त्री ने ही उसका सर काट कर दफना दिया था! जब तक स्त्री चंदेरी में भटकती थी, पुरुषों को उठा ले जाती थी तब तक सरकटा दफ़न ही रहा किंतु जब चंदेरी वालों के आग्रह पर “स्त्री” चंदेरी से चली गई तो उसके जाते ही सरकटे का आतंक शुरू हो गया! वो हर उस लड़की को, युवती को उठा ले जाता जो आधुनिक ख्यालों की होती, उसे स्त्रियों का, लड़कियों का पढ़ना–लिखना तो दूर उनका घर से बाहर निकलना तक स्वीकार्य नहीं था! इसलिए देखते ही देखते चंदेरी से अनेक ऐसी लड़कियां गायब हो गईं जो आधुनिक थीं, पढ़ी –लिखी थीं! सरकटे की असलियत से अनभिज्ञ चंदेरी वाले यही सोचते कि “अरे मॉर्डन लड़की थी, भाग गई होगी अपने प्रेमी के साथ, किसी बड़े शहर भाग गई होगी” !

यानि सरकटे जैसी मानसिकता वाले सैकड़ों लोग आज भी हमारे समाज में हैं जो जिन्हें पढ़ी–लिखी, नौकरी करने वाली, गाड़ी चलाने वाली, विचारशील, आधुनिक कपड़े पहनने वाली लड़कियां खटकती हैं! और जो यही मानते हैं कि “ऐसी लड़कियों के साथ तो गलत ही होना चाहिए”  ऐसे भी लोग हैं जो महज कपड़ों से, खान–पान से लड़कियों का चरित्र जज कर लेते हैं कि अरे सिगरेट पी रही थी, अरे ब्वॉयफ्रेंड है तो चरित्रहीन ही है…और जब किसी ऐसी युवती के साथ कोई घटना, कोई हादसा घट जाए तो ऐसे लोग कहते हैं अच्छा हुआ, ऐसा ही होना चाहिए था!!।

मुझे याद है निर्भया केस में भी एक वरिष्ठ महिला नेता ने और वकील ऐसे ही बयान दिए थे… और घूमों ब्यायफ्रेंड के साथ! उत्तर प्रदेश के एक नेता जी ने तो बलात्कार पर टिप्पणी करते हुए यह तक कहा था कि “लड़कों से गलती हो जाती है तो क्या इतनी सी गलती के लिए फांसी दे दोगे”  स्त्री 2 में सरकटा ऐसे सभी लोगों का प्रतीक है। जो चाहता है कि लोग उसकी बात माने उससे प्रभावित हो….

और ऐसा होता भी है कि चंदेरी के सब युवक एकजुट होकर यह घोषणा कर देते हैं कि “आज से लड़कियों, स्त्रियां घर पर ही रहेंगी, फैशन नहीं करेंगी, पढ़ाई नहीं करेंगी…. सिर ढंक के ,पल्ला–घूंघट करके रहेंगी, बाहर का सब काम पुरुष करेंगे” …यहां पर सरकटे पर रुद्र भैया (पंकज त्रिपाठी) का एक जोरदार संवाद है “सरकटा इन्फ्लूएंसर है जो वो चाहता है कि लोग उसकी सुने, उसकी बातें मानें, वो अपने फॉलोवर्स बढ़ाना चाहता है!”

स्त्री 2 में  सरकटा कई सुंदर ,पढ़ी लिखी आधुनिक युवतियों का अपहरण कर ले गया है, और उन्हें गंजा कर उन्हें सफेद साड़ियां पहना दी गई हैं। वो उनकी बलि देना चाहता है, यही उनकी सजा है…उसे स्त्री का यह आजाद, उन्मुक्त, आधुनिक  रूप स्वीकार्य नहीं! लेकिन फिल्म के अंत में सरकटे का खात्मा उसी स्त्री के हाथों होता है जो चंदेरी वालों के कहने पर चंदेरी छोड़कर चली गई थी! लोगों को लगता था कि उस स्त्री की ताकत तो उसकी चोटी में थी जिसे काट दिया गया था, किंतु साड़ी पहनी हुई, सिर पर पल्लू ढंकी हुई वो स्त्री ही अंततः सरकटे का अंत करती है जो आज भी उतना ही रूढ़िवादी है, जिसे साड़ी, पल्लू और घूंघट में रहने वाली स्त्रियां कमजोर लगती हैं और जो आधुनिक स्त्रियों, युवतियों को बुरी नजर से देखता है!

और यहां पर पंकज त्रिपाठी जी का एक जोरदार संवाद है “वो स्त्री है, परकटी होने के बावजूद कुछ भी कर सकती है।”

फिल्म में ऐसे कई संवाद हैं जो समाज की रूढ़िवादी, महिला विरोधी मानसिकता पर कटाक्ष करते हैं! वर्ष 2009 में महिला आरक्षण के मुद्दे पर भी एक सम्मानीय सांसद द्वारा इस तरह की भाषा का प्रयोग किया गया था कि “यदि यह बिल पास हो गया तो परकटी महिलाएं संसद में आ जाएंगी!! जो हम नहीं होने देंगे।”  मतलब स्त्रियों के बालों की लंबाई और छोटाई पर समाज के कुछ लोग पूर्वाग्रही होते हैं! स्त्री की सुंदरता, आकर्षण, पहचान, सौभाग्य सब कुछ उसके लंबे बाल हैं, वो बस सजने – संवरने में बितूती रहे! …

स्त्री का बुद्धिमान होना, विचारशील होना,तार्किक होना आत्मविश्वासी होना एक खतरे की घंटी हैं इनके लिए लिए!! उसके परकटी कह देंगे, फेमिनिस्ट कह देंगे…घर तोड़ूं,,चरित्रहीन सब बन जाएगी वो…लेकिन सोलह श्रृंगार करने वाली स्त्री भले दिनभर प्रपंच –पंचायत करे,लगाई –बुझाई करती, देवरों और जीजाओं से हंसी –ठिठोली करती फिरे फिरे वो श्रेष्ठ है,संस्कारी है!! किंतु बाहर जाकर पुरुषों के साथ काम करने वाली, हंसने –बोलने वाली स्त्री जिन्हें खटकती है! जिनकी नजर में स्त्री किसी पुरुष की दोस्त नहीं हो सकती! वो बेटी, बहु, पत्नी, मां, बहन या प्रेमिका ही हो सकती है!! उसका अपना कोई निजी अस्तित्व ही नहीं सकता…वो किसकी बेटी है या किसकी पत्नी है यही उसकी मूल पहचान है और इसी में उसका सम्मान है! जो स्त्री इस चलन को न मानती हो उसके साथ वही व्यवहार होना चाहिए जो सिरकटा करता है!!

दुखद है कि हमारे समाज में आज भी इस मानसिकता के लोगों का बोलबाला है! जिनके पास महिलाओं को देने के लिए उपदेश और पाबंदियों के सिवाय कुछ नहीं!! फिल्म “स्त्री 2 सिरकटे का आतंक” बहुत ही हास्य और व्यंग्य के रूप में ऐसे लोगों की मनोवृत्ति पर करारी चोट करती है! और एक सफलता व्यंग्य पूर्ण सिनेमा होने की कसौटी पर खरी उतरती है! फिल्म को देखने के बाद  मुझे हरिशंकर परसाई  के व्यंग्य याद आ जाते हैं, परसाई जी ने  व्यक्ति व समाज में उपस्थित विसंगति को लोगों के सामने लाने में व्यंग्य को सहायक माना है। उनके अनुसार, “व्यंग्य जीवन से साक्षात्कार करता है, जीवन की आलोचना करता है, विसंगतियों, मिथ्याचारों और पाखण्डों का पर्दाफाश करता है।”

फिल्म “स्त्री 2 सरकटे का आतंक” एक सफल, उद्देश्यपूर्ण सिनेमाई व्यंग्य है, इस तरह की फिल्में और बननी चाहिए!

(स्वतंत्र लेखिका एवं समीक्षक मध्यप्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन के कथेतर गद्य विधा के प्रतिष्ठित  “वागीश्वरी” सम्मान  स्व. हनुमान प्रसाद तिवारी स्मृति वागीश्वरी पुरस्कार –2023  से सम्मानित)

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