एनिमल और पुष्पा जैसी फिल्मों से गुमराह हो रहे हैं आज के युवा- यशपाल शर्मा

Pushpa 2
'पुष्पा 2' के एक गाने का दृश्य

जहां तक मौजूदा सिनेमाई परिदृश्य का सवाल है तो दोनों तरह का सिनेमा हमारे सामने बन रहा है। एक ओर करोड़ों रुपये खर्च कर बनाई गई एनिमल है तो दूसरी ओर बारहवीं फेल जैसी सार्थक फिल्म भी बनकर आई है। ऐसा पहले भी होता रहा है। जब बड़े-बड़े प्रगतिशील और महान फिल्मकार हमारे बीच मौजूद थे, तब भी घटिया कमर्शियल फिल्मों का निर्माण हो रहा था। एक ओर सार्थक फिल्मों की धारा और एक नाच-गाने वाली अर्थहीन फिल्मों की धारा, जिसे आप दर्शकों के दिल बहलावे वाला सिनेमा या शुद्ध मनोरंजन प्रधान फिल्मों की धारा कह सकते हैं।

हां, यह जरूर था कि तब गुरुदत्त, राजकपूर, बिमल रॉय, महबूब खान, के. आसिफ, विजय आनंद, कमाल अमरोही, गुलजार और ऋषिकेश मुखर्जी जैसे महान फिल्मकार सार्थक फिल्मों का निर्माण कर रहे थे। इनके अलावा समानांतर सिनेमा में सत्यजीत रे, मृणाल सेन, ऋत्विक षटक और श्याम बेनेगल जैसे दिग्गज फिल्मकार प्रगतिशील फिल्मों का निर्माण कर रहे थे। श्याम बेनेगल साहब तो आज भी सक्रिय हैं और उम्दा काम कर रहे हैं। आज की पीढ़ी की बात करूं तो शूजीत सरकार, अनुभव सिन्हा, हंसल मेहता जैसे फिल्मकार उम्दा फिल्मों का निर्माण कर रहे हैं। तो सब कुछ खत्म कभी नहीं होता। बीज रूप में कछ न कुछ बचा रह जाता है। और ये जो बचा रह जाता है यही एक दिन वृक्ष बन जाता है।

आप वेब सीरीज और ओटीटी पर रिलीज हो रही फिल्मों को देखिए तो आपकी समझ में आ जाएगा कि कितने कमाल का सिनेमा आज बन रहा है। कितनी अच्छी विषय वस्तु को लेकर फिल्मकार सार्थक सिनेमा का निर्माण कर रहे हैं। अभी सुमित सक्सेना ने कालकूट फिल्म का निर्माण किया है। आठ एपिसोड की यह वेब सीरीज आपको हिलाकर रख देगी। इसमें मैंने और गोपाल दत्त ने पुलिस अधिकारी की भूमिकाएं निभाई हैं। विजय वर्मा ने एक ईमानदार पुलिसकर्मी के रूप में कमाल का अभिनय किया है। उनकी मां की भूमिका वरिष्ठ अभिनेत्री सीमा विश्वास ने निभाई है। श्वेता त्रिपाठी शर्मा ने भी कमाल का अभिनय किया है। फिल्म एसिड अटैक से लेकर महिलाओं के खिलाफ अपराध की गंभीरता पर मजबूती से चोट करती है।

यह सारा काम युवाओं ने ही किया है। वैसे भी यह यूथ लड़के की ही कहानी है। उसके अंतर्दंद्व और कश्मकश को बड़ी गहराई में जाकर प्रदर्शित करती है फिल्म। उसका पुलिस में कोई इंटरेस्ट नहीं है। लेकिन जब वह उसका हिस्सा बनता है तो किस ईमानदारी से काम करता है देखने लायक है। इसी तरह पंचायत वेब सीरीज को देखिए। मास्टरपीस है यह। इस समय युवा अभिनेता और युवा फिल्मकार बेहतरीन काम कर रहे हैं। नए-नए सब्जेक्ट सामने आ रहे हैं और उन पर कमाल का काम हो रहा है।

एनिमल और पुष्पा बड़े लेवल की समस्या वाली फिल्में हैं। देखिए, यंग जेनरेशन की ऐसी समस्याएं हो सकती हैं। फिर सिनेमा में फैंटेसी के बगैर काम नहीं चलता। एनिमल का बड़ा प्रॉब्लम यह है कि आज का यूथ उस फिल्म से क्या संदेश लेकर घर जाए। यह युवाओं को गुमराह करने वाली फिल्म है। फिल्म देखने वाले गए होंगे उसे तभी तो वह सफल हुई। तो हमें भी सोचना पड़ेगा इस पर। जिन युवाओं ने यह फिल्म देखी है उन पर क्या इंपैक्ट पड़ा होगा इस फिल्म का। वे सोच रहे होंगे यार हम तो नहीं कर पाए पर इस लड़के ने कर दिया। सिनेमा दिलो-दिमाग पर जबरदस्त प्रभाव छोड़ने वाली विधा है तो एनिमल फिल्म बनाने वाले को इस बारे में सोचना चाहिए कि वे युवाओं को क्या संदेश देना चाह रहे हैं।

बारहवीं फेल देखकर नौजवान एक सार्थक संदेश लेकर घर जाता है। कई दिनों तक उसकी कहानी दिलो-दिमाग पर छाई रहती है। तो सिनेमा को ऐसा होना चाहिए। तकनीक काफी आगे चली गई है। सोशल मीडिया है, मोबाइल है तो इसमें आप अच्छी चीजें भी देख सकते हो। इसी में गलत दिशा में बढ़ेंगे तो इसमें पॉर्न फिल्में भी हैं। अब ये आप पर निर्भर करता है कि आप किसे चुनते हैं। एनिमल में भयंकर हिंसा है। इसी थीम पर दिलीप कुमार और अमिताभ बचचन की फिल्म शक्ति बनी थी। दोनों फिल्मों को देखिए, मसला एक ही है पर उसे एनिमल में कैसे ट्रीट किया गया है।

मैं जोर देकर यह कहना चाहता हूं कि अभिनेताओं को भी फिल्में चुनते वक्त यह देखना चाहिए कि वह उन्हीं फिल्मों को चुनें जिनमें दर्शकों के लिए और समाज के लिए कोई संदेश हो। उनके पास चॉइस है कि वे अच्छी फिल्म चुनें या घटिया फिल्म। उनके पास अब काफी विकल्प हैं। अब पैसे के लिए कुछ भी करेंगे तो फिर ऐसी फिल्में बनेंगी ही बनेंगी। अभिनेताओं को इस मानसिकता से निकलना होगा। उन्हें देखना चाहिए फिल्म की कहानी कैसी है, टीम कैसी है। एनिमल सोच-समझकर बनाई गई फिल्म है। निर्देशक की सोच है वह तभी बनी है।

दुनिया कुछ भी कर ले अब हृषिकेश मुखर्जी की सत्यकाम जैसी फिल्म तो बन नहीं सकती। कहने का मतलब यह है कि सत्यकाम के यूथ को छूने वाली फिल्म आज का कोई फिल्मकार नहीं बना सकता। वह एक कला फिल्म थी। थोड़ा स्लो जरूर थी। उसका नायक ईमानदारी के लिए क्या कुछ नहीं करता। नौकरी चली गई, पत्नी ने ठुकरा दिया। धर्म-जात का उसके लिए कोई मतलब नहीं है। मैं आज के हालात को देखकर जब कभी विचलित होता हूं तो घर पर इस फिल्म को देखता हूं और आत्मिक शक्ति ग्रहण करता हूं। इसी तरह विजय आनंद साहब की गाइड से आध्यात्मिक ताकत पाता हूं। सिनेमा का एक ही मकसद है दर्शकों को कुछ ऐसा देना जो वह घर लेकर जाए। अब घर वह कोई सार्थक संदेश लेकर जाए या फिर फिल्म से कोई गंदगी लेकर घर पहुंचे। यही युवा फिल्मकारों के लिए एक बड़ा सवाल है और बड़ी चुनौती भी। •

(प्रसिद्ध अभिनेता और फिल्ममेकर यशपाल शर्मा से वरिष्ठ फिल्म पत्रकार दीप भट्ट की बातचीत पर आधारित। हल्द्वानी में निवास। संपर्क- [email protected]

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