*पूजा श्रीवास्तव
हम सदैव से सुनते आए हैं कि साहित्य समाज का दर्पण है किन्तु आधुनिक समाज में फिल्में और टीवी धारावाहिक भी अब समाज के दर्पण के रूप में उभरे हैं। आज के समाज की तस्वीर साहित्य के साथ-साथ फिल्मों और धारावाहिकों के बिना अधूरी है। आज फिल्में और टीवी धारावाहिक ना केवल सामयिक परिस्थितियों से प्रेरणा लेते हैं, बल्कि उन्हें किसी ना किसी रूप में प्रभावित भी करते हैं।
बदलती सामाजिक परिस्थितियों के चलते ज्ञान, सूचना और मनोरंजन के साधन बदले; समाज, साहित्य, टीवी कार्यक्रमों और फिल्मों के बीच सहूलियतों का सम्बन्ध विकसित हुआ जिसमें पारस्परिक आदान-प्रदान की स्थितियों को बल मिला। शायद यही कारण रहा कि साहित्य जगत में अपना विशेष स्थान रखने वाले लेखकों ने सिनेमा और टीवी जगत को अ-छूत नहीं समझा और इन क्षेत्रों में भी अपनी प्रतिभा दिखाई। यहां तक कि हिंदी कथा साहित्य के पितामह के रूप में ख्यात मुंशी प्रेमचन्द ने भी सिनेमा जगत में अपने कदम बढ़ाये थे।
महात्मा गांधी के आह्वान पर अपनी नौकरी का त्याग करने वाले, ‘माधुरी’, ‘मर्यादा’ और ‘हंस’ का सम्पादन करने वाले, ‘गबन’, ‘गोदान’ और ‘निर्मला’ जैसे उत्कृष्ट उपन्यासों की रचना करने वाले प्रेमचन्द ने मोहन दयाराम भवनानी की अजंता सिनेटोन कम्पनी में बतौर कहानी लेखक की नौकरी स्वीकार कर ली थी। इस दौरान उन्होंने ‘मजदूर’नामक फिल्म की कहानी लिखी जो 1934 में प्रदर्शित हुई। फिल्म को मोहन भवनानी ने निर्देशित किया था। फिल्म की कहानी में तत्कालीन भारत में तेजी से पैर पसार रहे औद्योगीकरण के प्रभाव को तभी दिखा दिया गया था, जिसमें मजदूरों के शोषण को विशेष तौर पर चित्रित किया गया था। लेकिन इस फिल्म को तब के मिल मालिकों के संगठनों का भारी विरोध झेलना पड़ा और फिल्म बॉक्स ऑफिस पर व्यावसायिक प्रदर्शन नहीं कर सकी। प्रेमचन्द इस फिल्म को लिखने के बाद बहुत समय तक फिल्मी दुनिया में नहीं स्थिर सके और वापस अपनी साहित्य की दुनिया में आ गए।
यद्यपि प्रेमचन्द एक ही फिल्म लिखने के बाद फिल्म जगत से ऊब कर वापस आ गये थे लेकिन साहित्य के इतिहास में ऐसे कई साहित्यकारों के नाम दर्ज हैं जिन्होंने सिनेमा के साथ-साथ टीवी जगत के लिये खूब लिखा। इनमें एक नाम कमलेश्वर का है। कमलेश्वर ने उपन्यास लिखे, कहानियां, नाटक, संस्मरण लिखे साथ ही कई हिंदी फिल्मों की पटकथा भी लिखी। कमलेश्वर ने ‘सारिका’, ‘दैनिक जागरण’ और ‘दैनिक भास्कर’ जैसे प्रकाशनों का सम्पादन भी किया। दूरदर्शन के अतिरिक्त महानिदेशक के पद आसीन रह चुके कमलेश्वर को भारत सरकार ने पद्म भूषण से सम्मानित भी किया। कमलेश्वर ने फिल्म जगत में जाने के दौरान कहा भी था कि “जिस जगह से प्रेमचंद असफल होकर लौट आए, वहां वो अपनी सी जगह बनाएंगे”। और वह हुआ भी।
कमलेश्वर ने वर्ष 1970 में फिल्म जगत की ओर रुख किया और फिल्मों के लिए पटकथा और संवाद लिखना शुरू किया। इनमें ‘आंधी’, ‘मौसम’, ‘रजनीगंधा’ (‘यही सच है’-मन्नू भंडारी की रचना पर आधारित) ‘छोटी सी बात’, ‘रंग-बिरंगी’ के साथ ही रवि चोपड़ा की थ्रिलर ‘द बर्निंग ट्रेन’ जैसी फिल्में भी शामिल हैं।
इतना ही नहीं, विभिन्न रोचक कार्यक्रमों के माध्यम से टीवी को भी घर-घर में लोकप्रिय बनाया। वर्ष 1980-82 के अपने दो साल के कार्यकाल में कमलेश्वर ने विभन्न दिलचस्प, मनोरंजक और ज्ञानवर्धक कार्यक्रमों का निर्माण किया। इन कार्यक्रमों के प्रसारण के साथ ही दूरदर्शन की गरिमा और लोकप्रियता में चार चांद लग गये। ‘चन्द्रकान्ता’, ‘आकाश गंगा’, ‘बेताल पच्चीसी’, ‘युग’, ‘दर्पण’ और ‘एक कहानी’ जैसे सीरिज के जरिए कमलेश्वर ने टीवी जगत में नया इतिहास रचा। इतना ही नहीं, उन्होंने दूरदर्शन के लिये ‘परिक्रमा’नामक एक टॉक शो की मेजबानी की, साथ ही एक सप्ताहिक साहित्यिक कार्यक्रम ‘पत्रिका’की भी शुरुआत की। यह दोनों कार्यक्रम बहुत लोकप्रिय हुए। इन सभी कार्यक्रमों के अतिरिक्त कमलेश्वर ने दूरदर्शन के लिए अनेक सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर वृत्तचित्रों का निर्माण व निर्देशन भी किया।
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इस क्रम में आधुनिक हिंदी साहित्य के एक महत्वपूर्ण रचनाकार मनोहर श्याम जोशी की चर्चा भी प्रासंगिक है। वे ना केवल एक उत्कृष्ट साहित्यकार थे, अपितु एक प्रखर पत्रकार, पटकथा व संवाद लेखक भी थे। साहित्य और पत्रकारिता के साथ फिल्म और टीवी के लिए भी वह समान अधिकार से लिखते थे। विशेषकर टीवी के लिए उनके लेखन के अवदान को कभी भी भुलाया नहीं जा सकता है। उनके द्वारा लिखे गये धारावाहिक ‘हमलोग’ और ‘बुनियाद’ तो टीवी जगत के इतिहास में मील के पत्थ के समान स्थापित हैं। इसके अतिरिकत ‘कक्का जी कहिन’ (इनके अपने उपन्यास ‘नेता जी कहिन’पर आधारित), ‘मुंगेरी लाल के हसीन सपने’, ‘हमराही’, ‘जमीन आसमान’ जैसे धारावाहिकों को दर्शकों का खूब प्यार मिला। इन्होंने बहुत अधिक फिल्मों के लिये तो लेखन नहीं किया किन्तु जितना भी लिखा बहुत विविधतापूर्ण और उम्दा लिखा। उदाहरण के लिए ‘हे राम’जहां बेहद गंभीर विषय को लेकर चलती है वहीं ‘पापा कहते हैं’ एक हल्की-फुल्की रोमांटिक किस्म की फिल्म है। इसके अलावा ‘अप्पू राजा’, ‘भ्रष्टाचार’ और ‘रात’ जैसी फिल्में भी इन्होंने लिखी है।
मनोहर श्याम जोशी के ही समान शरद जोशी ने भी अपनी लेखनी से साहित्य व पत्रकारिता के साथ-साथ सिनेमा पटल व टीवी को भी समृद्ध किया। शरद जोशी मूलतः व्यंग्य लेखक थे। 21 मई 1931 को इन्दौर में जन्में शरद जोशी ने अपने करियर की शुरुआत रेडियो और समाचार पत्रों से की। इनके लघु, व्यंग्य लेख उस समय के प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं मे प्रकाशित होते थे जैसे नई दुनिया, रविवार, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, कादम्बरी और ज्ञानोदय आदि। नवभारत टाइम्स में उनका दैनिक कॉलम प्रतिदिन सात वर्षों तक प्रकाशित हुआ। शरद जोशी की चर्चित रचनाओं में परिक्रमा, किसी बहाने, तिलिस्म, जीप पर सवार इल्लियां, रहा किनारे बैठ प्रमुख हैं।
शरद जोशी ने कई फिल्मो में संवाद लेखन भी किया। इनमें ‘क्षितिज’, ‘छोटी सी बात’, ‘सांच को आंच नहीं’, ‘चोरनी’, ‘उत्सव’, ‘नाम’, ‘चमेली की शादी’, ‘दिल है कि मानता नहीं’ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
इसी क्रम में एक और शख्स का उल्लेख करना बेहद जरूरी है और वह हैं महाभारत जैसे महाकाव्य का संवाद लेखन करने वाले डॉ0 राही मासूम रजा। यूपी के गाजीपुर जिले में जन्में राही जी ने अपनी आरम्भिक शिक्षा गाजीपुर से और उच्च शिक्षा अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटी से ग्रहण की। भारतीय साहित्य में शोध करने वाले रजा साहब ने आंधा गांव, दिल एक सादा कागज, टोपी शुक्ला, ओस की बूंद जैसे उपन्यास लिखे हैं। इन्होंने दूरदर्शन के लिए ‘नीम का पेड़’ धारावाहिक लिखा जो वर्ष 1991 में प्रसारित हुआ। महाभारत जैसे महाकाव्य की गरिमा को बनाये रखकर उसे जन-जन तक पहुंचाने का श्रेय भी रजा साहब को जाता है इन्होंने कई हिंदी फिल्मों की पटकथा लिखी इनमें ‘किसी से न कहना’’, ‘मैं तुलसी तेरे आंगन की’, ‘डिस्को डांसर’ का नाम प्रमुख हैं। इसके अलावा ‘आईना’, ‘परम्परा’, ‘लमहे’, ‘कर्ज’, ‘जुदाई’, ‘हम पांच’, ‘गोलमाल’, ‘अलाप’, ‘बात बन जाये’ के संवाद भी लिखे। इन्होंने अमिताभ बच्चन और रेखा अभिनीत फिल्म ‘अलाप’ के गीत भी लिखे थे।
सिनेमा में पटकथा, कहानी और संवाद के अलावा गीतों की भी बहुत अ़हम् भूमिका होती है। हिंदी और उर्दू साहित्य की कई नामचीन हस्तियों ने फिल्मों के लिये खूब लिखा। कवि प्रदीप हो या साहिर लुधियानवी, हसरत जयपुरी हों या कैफी आजमी सबने अपनी कलम से हिंदी फिल्मों को शब्द और स्वर दिए। कवि प्रदीप ने जहां ‘ऐ मेरे वतन के लोगों जरा आंख में भर लो पानी’, ‘दूर हटो ऐ दुनिया वालों हिन्दुस्तान हमारा है’ जैसे देशभक्ति से ओतप्रोत गीत दिये वहीं साहिर लुधियानवी ने ‘कभी-कभी मेरे दिल में ख्याल आता है’, ‘चलो एक बार फिर से अजनबी बन जायं हम दोनों’ जैसे शुद्ध रोमांटिक गीत लिखे।
यहां कैफी आजमी और गोपाल दास नीरज का उल्लेख करना भी बहुत प्रासंगिक है। कैफी आजमी उर्दू शायरी के आसमान में एक सितारे की तरह चमकते रहे हैं। प्यार, मोहब्बत, इश्क की गजलें लिखने वाले आजमी ने सामाजिक सरोकारों पर भी खूब लिखा और बहुत उम्दा लिखा। फिल्मों के लिए कैफी साहब ने गीत भी लिखे और संवाद भी। कैफी साहब ने सबसे पहले फिल्म ‘बुजदिल’ के लिए गीत लिखे। फिल्म को निर्देशित किया था शाहिद लतीफ ने। उसके बाद ‘यहूदी की बेटी’, ‘परवीन’, ‘मिस पंजाब मेल’ और ‘ईद का चांद’ के लिए भी लिखा।
कैफी साहब की एक बेहद यादगार फिल्म है ‘हीर-रांझा’। चेतन आनन्द की इस फिल्म के लिए कैफी साहब ने संवाद लिखे थे इस फिल्म की विशेषता यह है कि इसके सारे संवाद कविता शैली में है। अपनी इस विशिष्टता के कारण यह फिल्म सिनेमा के इतिहास में एक खास मुकाम रखती हैं। इन्होंने वर्ष 1974 में प्रदर्शित हुई फिल्म ‘गर्म हवा’ (इस्मत चुगताई के उपन्यास गर्म हवा पर बनी) के लिये भी पटकथा, संवाद व गीत लिखे। इस फिल्म के लिये उन्हें बहुत प्रशंसा हासिल हुई। इसके अलावा श्याम बेनेगल की फिल्म ‘मंथन’ (1976) के संवाद भी लिखे। गीतकार के रूप में भी कैफी साहब का लेखन बेजोड़ रहा है। चाहे गुरुदत्त की ‘कागज के फूल’ हो या चेतन आनन्द की ‘हकीकत’, कैफी साहब ने हिंदी फिल्मी गीतों को नई बुलन्दियों तक पहुंचाया। ‘कागज के फूल’ का ‘देखी जमाने की यारी…’ और ‘हकीकत’ का ‘कर चले हम फिदा जानोतन साथियों…’ तो सिनेमा के इतिहास में अमर हो गये हैं। इनके अलावा कोहरा, अनुपमा, उसकी कहानी, सात हिन्दुस्तानी, शोला और शबनम, परवाना, बावर्ची, पाकीजा, हंसते जख्म, अर्थ और रजिया सुल्ताना के गीतों को भी भुलाया नहीं जा सकता। वर्ष 1967 में कैफी साहब ने एक गीत लिखा था फिल्म नौनिहाल के लिये, इस गीत को तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू की अन्तिम यात्रा के दौरान फिल्माया गया। गीत आज भी लोगों को भावुक कर देता है। गीत के बोल थे-‘मेरी आवाज सुनो, प्यार का राज सुनो।‘
कैफी साहब की ही तरह नीरज ने भी सिनेमा जगत को अविस्मरणीय गीत दिए हैं। वर्ष 1925 मे इटावा में जन्में नीरज मूलतः कवि रहे हैं। इन्होंने कई हिंदी फिल्मों को अपने गीतों से सजाया-संवारा हैं। फिल्म ‘गैम्बलर’ का गीत ‘दिल आज शायर है’, ‘प्रेम पुजारी’ का ‘शोखियों मे घोला जाये’ और ‘फूलों के रंग से दिल की कलम से’, ‘नई उमर की नई फसल’ का ‘कारवां गुजर गया गुबार देखते रहें’ या फिर ‘शर्मीली’ का ‘खिलते हैं गुल यहां खिल के बिखरने को’, जैसे गीत कभी भी भुलाए नहीं जा सकते।
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इन रचनाकारों के अलावा हिंदी साहित्य के कई ऐसे मूर्धन्य रचनाकार रहे हैं जिन्होंने सिनेमा अथवा टेलीविजन जगत को अपना योगदान दिया हैं। प्रेमचन्द के बाद हिंदी के सुप्रसिद्ध कथाकारों में से एक यशपाल के ‘गुलदस्ता’ और ‘जीवन के रंग’ पर साल 1995 और वर्ष 2005 टीवी सीरीज का निर्माण हुआ। इसी प्रकार हिंदी साहित्य के अमर सितारे भगवती चरण वर्मा के उपन्यास ‘चित्रलेखा’ पर जहां फिल्म का निर्माण हुआ वहीं उन्होंने दूरदर्शन के लिए दो धारावाहिकों का लेखन भी किया। पहला था, ‘तीन वर्ष’ और दूसरा ‘जय पराजय’। सितारों के खेल, गिरती दीवारें, गर्म राख जैसे उपन्यास लिखने वाले उपेन्द्रनाथ ‘अश्क’ने भी कुछ समय तक सिनेमा जगत में अपनी कलम चलाई। उन्होंने ना केवल फिल्मों के गीत, कहानी व संवाद लिखे बल्कि ‘मजदूर’ और ‘आठ दिन’ जैसी फिल्मों में अभिनय भी किया। फिल्मों में अभिनय की बात करें तो साहित्य अकादमी सम्मान से पुरस्कृत और ‘तमस’ जैसे उपन्यास के लेखक भीष्म साहनी ने सईद मिर्जा की ‘मोहन जोशी हाजिर हो’, ‘तमस’, कुमार साहनी की ‘कस्बा’, ‘लिटिल बुद्धा’ और ‘मि. और मिसेज अय्यर’ में भी अभिनय किया था।
साहित्य और सिनेमा में साहित्यकारों के योगदान की बात हो और उन फिल्मों का जिक्र ना हो जो किसी रचनाकार की रचना पर बनी है तो ये लेख अधूरा ही रहेगा। ‘आनन्दमठ’ (बंकिम चन्द्र चटर्जी), ‘देवदास’, ‘अपने पराये’ (शरद चन्द्र चट्टोपाध्याय), ‘बालिका बधू’ (बिमल कार) ‘बंदनी’, ‘शतरंज के खिलाड़ी’ (प्रेमचन्द्र) ‘सरस्वती चन्द्र’ (गुजराती लेखक गोवर्धन माधवराम त्रिपाठी) ‘सारा आकाश’ (राजेन्द्र यादव) ‘रजनीगंधा’ (मन्नू भंडारी) ‘गाइड’ (आर.के. नारायन) ‘उमराव जान’ (मिर्जा हादी रुस्वा) जैसी अनगिनत फिल्में हैं। इसके अलावा शेक्सपियर के उपन्यासों ‘मैकबेथ’ और ‘औथेलो’, से प्रेरित ‘मकबूल’ और ‘ओमकारा’ जैसी फिल्में बना चुके विशाल भारद्वाज ने शेक्सपीयर के ही एक अन्य उपन्यास ‘हैमलेट’ पर ‘हैदर’ का भी निर्माण किया। आज के सबसे चर्चित और लोकप्रिय लेखक चेतन भगत के उपन्यासों पर कई फिल्में बन चुकी हैं। चेतन भगत के साथ ही कई अन्य युवा लेखक वर्तमान में सिनेमा जगत के लिए लिख रहे हैं।
कोई संदेह नहीं कि सिनेमा और टीवी जगत को सजाने-संवारने और उसे समृद्ध करने में साहित्यकारों की भूमिका बड़ी रही है। इस क्रम में एक और शख्सियत को याद करना बेहद जरूरी है और वह हैं मशहूर व्यंग्य लेखक केपी सक्सेना। केपी यूं तो रेलवे की सरकारी नौकरी में थे लेकिन लेखन उनके लिए प्राण वायु की तरह था। केपी साहब ने विभिन्न पत्र पत्रिकाओं के माध्यम से व्यंग्य लेखन के क्षेत्र में अपनी एक पहचान बनाई थी और हरिशंकर परसाई, शरद जोशी और श्रीलाल शुक्ल की श्रेणी में स्वयं को लाकर खड़ा कर दिया था। उन्होंने दूरदर्शन के लिए एक बेहद लोकप्रिय धारावाहिक बीवी नातियों वाली का लेखन किया। फिल्मों में उनका पर्दापण फिल्म ‘लगान’ के साथ हुआ। फिल्म के निर्देशक आशुतोष गोवारिकर को इस फिल्म के लिए जिस तरह की अवधि भाषा और शैली की आवश्यकता थी केपी को उसमें महारत हासिल थी। इसके बाद वर्ष 2004 में उन्होंने आशुतोष गोवारिकर की दूसरी फिल्म ‘स्वदेश’ के संवाद भी लिखे। इन दो फिल्मों के अलावा उन्होंने ‘हलचल’ और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर बनी ‘जोधा-अकबर’ के संवाद भी लिखे।
इन सभी लेखकों, कवियों और गीतकारों के अतिरिक्त भी बहुत से ऐसे नाम होंगे जो निश्चित रूप से इस में छूट गए होंगे किन्तु इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि उनका महत्व कहीं से भी कमतर है। रुपहले परदे और साहित्य की परस्पर निर्भरता ने जहां सिनेमा को उत्कृष्ट गीत, कथाएं व पटकथाएं दी वहीं साहित्यकारों की प्रतिभा को भी नए-नए आयाम दिए। (पिक्चर प्लस, 2016 में प्रकाशित)
(लेखिका वरिष्ठ मीडिया प्रोफेशनल और लखनऊ दूरदर्शन में न्यूज रीडर हैं, लखनऊ में निवास।)
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