संसद को फिल्मी कलाकार सीरियसली लें…पिक्चर प्लस से बोले डायरेक्टर सुधीर मिश्रा

Sudhir Mishra
फिल्ममेकर सुधीर मिश्रा

मैंने अपने लंबे सिनेमाई सफर में राजनीतिक फिल्में भी बनाई हैं। राजनीति का मर्म और धर्म समझता हूं। इसलिए मैं फिल्मी सितारों के सियासत में जाने का विरोधी नहीं हूं। सितारे शौक से सियासत में जाएं पर वहां सिर्फ अपना नाम भुनाने के लिए न जाएं। राजनीति को कोई खेल न समझें। राजनीति को सीरियसली लें और उसे समाजसेवा का जरिया समझें। इसलिए मेरा मानना है कि राजनीति में बहुत पैशनेट और गंभीर किस्म के लोग जाएं।

अब तक जो फिल्मी सितारे राजनीति में गए हैं उनमें शत्रुघ्न सिन्हा और शबाना आजमी ने गंभीर किस्म की राजनीति की है। खासकर शबाना आजमी ने। उन्होंने समाज के लिए काफी काम किया है। उनकी अपनी एक विचारधारा भी है। यही वजह है कि उन्होंने सदन में समाज के दु:ख-दर्दों को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। राज बब्बर का नाम लेना चाहूंगा। उन्होंने भी राजनीति को सीरियसली लिया है, और काफी काम किया है। वे लोगों के बीच जाते हैं, और उनके दु:ख-दर्द को समझने की कोशिश करते हैं। तो, ये एक अच्छी बात है। मेरा मानना है कि सियासत में ऐसे लोग नहीं जाने चाहिए जो वहां जाकर नाम फिक्सिंग का गेम खेलें। आज जहां राजनीतिक व्यवस्था पहुंच गई है वहां तो अगर कोई फिल्मी सितारा सियासत में जाने की बात सोच रहा है तो उसे बहुत ही पैशनेट और सोशल कमिटमेंट का होना चाहिए। तभी वह सियासत के गलियारे में जाकर जनता के लिए कुछ कर सकता है।
मैं समझता हूं आज जो फिल्मी सितारे राजनीति में जा रहे हैं उन्हें वहां जाने से पहले, वे जहां हैं, वहां समाज के लिए कुछ करना चाहिए। उनका एक अनुभव होना चाहिए समाज के बीच काम करने का। तभी तो उनका अपना एक विशिष्ट व्यक्तित्व बनेगा। अपनी एक खास पहचान बनेगी। अगर ऐसा नहीं है तो सियासत में जाकर खाली नाम चमकाने का काम करने से कुछ नहीं होगा।

सियासत में जाकर कुछ काम करने का जज्बा अगर मैंने अपने जीवन में किसी में देखा है तो वे थे सुनील दत्त। वे समाज और सियासत के एक आदर्श पुरुष थे। उन्होंने विभिन्न सामाजिक मुद्दों को लेकर कितनी पदयात्राएं की। लोगों से किस कदर बातें कीं। तो उनका जनता से, समाज से बड़ा गहरा रिश्ता था। वे एक मिसाल छोड़कर गए हैं फिल्म इंडस्ट्री में समाज सेवा के मामले में। नए सितारों को उनसे सीखना चाहिए। उन्होंने फिल्म के लोगों की समस्याओं को हल करने के लिए भी काफी काम किया।

फिल्मी सितारों का सियासत का दामन थामने से पहले अपनी भी कुछ खास विशेषताएं होनी चाहिएं। वो किसी भी फील्ड में हो सकती हैं। इससे लोगों में उनके प्रति यह विश्वास बनता है कि ये आदमी तो पहले से समाज के लिए कुछ न कुछ करता रहा है। वरना होता क्या है कि सितारे राजनीति को बहुत हल्के में लेते हैं। मैं समझता हूं सिर्फ फिल्मी सितारे ही क्यों हर क्षेत्र के लोग सियासत में जाएं। ऐसे लोग जिन्होंने अलग-अलग क्षेत्र में देश के लिए कुछ किया है या कुछ करने का जज्बा रखते हैं। अगर ऐसे लोग सियासत में जाएंगे तो सियासत का चरित्र भी बदलेगा और उसकी दिशा भी ठीक हो सकती है। ऐसे लोग संसद में जाकर समाज को लेकर एक अच्छा बहस-मुबाहसा कर सकते हैं। इसका फायदा जनता को मिलेगा।

एक और महत्वपूर्ण बात मैं कहना चाहता हूं। समाज में और राजनीति में सनसनी फैलाने से बचना चाहिए। सिनिसिज्म किसी सूरत में नहीं होना चाहिए। सिनिसिज्म हर चीज में बिगाड़ लाता है। चीजों का स्वरूप खराब करता है। इसमें मैं सितारों से ही अपेक्षा नहीं कर रहा, जनता से भी अपेक्षा कर रहा हूं। अगर सिनिसिज्म को बढावा मिला तो फिर राजनीति के मुखिया के तानाशाह बनने के खतरे बढ़ जाते हैं। व्यवस्था और राजनीति का स्वरूप विकृत हो जाता है। हम लोकशाही में रहने के आदी हैं। किसी भी किस्म की तानाशाही समाज में बिगाड़ लाती है। उसकी संरचना में बिगाड़ लाती है। तो इससे सितारे और लोग बचें।

आपने अभी हाल में बनी प्रोपेगेंडा फिल्मों को लेकर सवाल किया तो मैं जवाब में आपसे कहना चाहूंगा। हर तरह की फिल्म बननी चाहिए। मेकर को आजादी होनी चाहिए कि वह अपनी सोच की फिल्म बना सके। वरना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का क्या मतलब रह जाएगा। जिन्हें आप प्रोपेगैंडा फिल्में कह रहे हैं क्या उनकी कोई विषय-वस्तु नहीं है। क्या समाज में उस तरह की बात नहीं है। उसे बनने दीजिए। हर तरह की फिल्म बनने दीजिए। जनता तय करेगी कि जो फिल्म फिल्मकार ने बनाई है वह अच्छी है या बुरी। आखिरकार जनता ही फैसला करती है किसी भी फिल्म के बारे में। हम पहले से किसी फिल्म के बारे में कोई धारणा क्यों बना लें। सब कुछ जनता पर छोड़ दें।

*(लेखक प्रसिद्ध फिल्ममेकर हैं। वरिष्ठ फिल्म पत्रकार दीप भट्ट से बातचीत पर आधारित।) 

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