(अंकुर, निशांत, मंथन, जुबैदा, कलयुग जैसी समानांतर सिनेमा के डायरेक्टर श्याम बेनेगल का 23 दिसंबर, 2024 को 90 साल की आयु में निधन हो गया। पिक्चर प्लस पत्रिका के नवंबर-दिसंबर, 2024 अंक में सिनेमा दुनिया की किन हस्तियों को भारत रत्न मिलना चाहिए, इस मुद्दे पर बहस रखी गई थी। इसमें ज्यादातर लोगों ने श्याम बेनेगल को भारत रत्न देने की मांग की। यह अंक उनके जीवित रहते प्रकाशित हुआ था। वरिष्ठ फिल्म पत्रकार दीप भट्ट के सौजन्य से आर्ट डायरेक्टर नितीश रॉय के विचार प्राप्त हुए थे। पिक्चर प्लस पढ़ने के लिए क्लिक करें)
मैंने अपने सिनेमाई सफ़र का सबसे शानदार काम महान फिल्मकार मृणाल सेन और श्याम बेनेगल साहब के साथ किया है। बेनेगल साहब लिविंग लीजेंड हैं। जहां तक सत्यजित राय, मृणाल सेन और श्याम बेनेगल साहब की तुलना करने का सवाल है तो यह असंभव है। तीनों सिनेमा के दिग्गज हैं। बल्कि मैं तो कहूंगा तीनों सिनेमा के धुरंधर हैं। जहां तक श्याम बेनेगल साहब को भारत रत्न देने का सवाल है तो इस वक्त उनके अलावा भारतीय फिलमोद्योग में ऐसा कौन सा दूसरा फिल्मकार है जिसे यह सम्मान दिया जाना चाहिए। मैं समझता हूं कि कोई भी नहीं है।
यह हमारा सौभाग्य है कि वह नब्बे वर्ष की आयु में भी हमारे बीच मौजूद हैं और काम कर रहे हैं। मैंने उनकी तकरीबन सारी फिल्मों का कला निर्देशन किया है। उनकी अंकुर, निशांत, मंडी, त्रिकाल, सुष्मन और सूरज का सातवां घोड़ा कितने कमाल की फिल्में हैं। उन्होंने समांतर सिनेमा का नेतृत्व किया और देश समाज को एक से बढ़कर एक अर्थपूर्ण फिल्में दी। उन्होंने हमेशा अपनी शर्तों पर काम किया। कभी किसी प्रकार का समझौता नहीं किया। उनकी देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की विश्व प्रसिद्ध किताब डिस्कवरी ऑफ इंडिया को बेस बनाकर निर्मित किया गया दूरदर्शन धारावाहिक भारत एक खोज कितना अद्भुत धारावाहिक था। इसका कला निर्देशन मैंने ही किया था।
उनकी लेटेस्ट फिल्म शेख़ मुजीब का कला निर्देशन भी मैंने ही किया। उनकी सिनैमैटिक समझ अद्भुत है। वे अपने आप में एक आर्ट पीस हैं। उनके ज्ञान की थाह पाना बहुत मुश्किल है। उनकी ऐतिहासिक समझ को लो या साइंटिफिक नॉलेज को लो या माइथॉलाजिकल समझ को लो, सभी अद्भुत हैं।
वैसे तो उनकी सभी फिल्में अद्भुत हैं लेकिन जब भी मैं उनकी भूमिका फिल्म को देखता हूं तो एक फिल्मकार के रूप में उनका मुरीद हो जाता हूं। वैसी फिल्म आज़ तक किसी फिल्मकार ने नहीं बनाई है। उनकी अंकुर का एक अलग मुकाम है। निशांत कमाल की फिल्म है। श्याम बेनेगल साहब ने ओमपुरी और नसीरुद्दीन शाह जैसे महान अभिनेता भारतीय फिल्मोद्योग को दिए। वे सिनेमा के दिग्गज डायरेक्टर हैं।
हालांकि शबाना आज़मी और स्मिता पाटिल ने तमाम कमर्शियल फिल्मों में काम किया है। लेकिन श्याम बेनेगल साहब की फिल्मों में इन दोनों अभिनेत्रियों का काम देखेंगे तो आपको महसूस होगा कि जितना जीवंत और स्वत: स्फूर्त अभिनय इन दोनों अभिनेत्रियों ने वहां किया है वह किसी दूसरे फिल्मकार की फिल्मों में नहीं किया। उनका निर्देशकीय ज्ञान और क्षमता अद्भुत है।
ऐसा नहीं है कि भारतीय फिल्मोद्योग में अतीत में और फिल्मकारों का कोई योगदान नहीं है पर श्याम बेनेगल समानांतर सिनेमा में एक किंवदंती की तरह हैं। उन्हें क्या कहूं। वे सिनेमा के पुरोधा हैं, सिनेमा के किसी प्रोफेसर की तरह हैं। उन्होंने अपने सिनेमा से जनता की तमाम तरह की कमज़ोरियों को दुरुस्त कर उन्हें एक अच्छा और मजबूत इंसान बनाने की कोशिश की है।
वह सिनेमा की प्रगतिशील धारा के वाहक हैं। यह काम मुख्य धारा के कमर्शियल सिनेमा के होते हुए कितना मुश्किल है इसे कोई अच्छा काम करने वाला फिल्मकार ही समझ सकता है। भारत सरकार की जो ज्यूरी भारत रत्न देने का फैसला करती है उसे यह समझना चाहिए कि भारतीय फिल्मोद्योग में श्याम बेनेगल साहब किसी लिविंग लीजेंड की तरह हैं और अभी हमारे बीच हैं। मरणोपरांत किसी व्यक्ति को सम्मान देना उतना मायने नहीं रखता जितना कि जीते जी। श्याम बेनेगल साहब को उनके जीते जी भारत रत्न मिले तो यह पूरे फिल्म जगत का और पूरे देश का सम्मान होगा। (वरिष्ठ फिल्म पत्रकार दीप भट्ट से बातचीत पर आधारित तथा पिक्चर प्लस, नवंबर-दिसंबर, 2024 अंक में प्रकाशित)
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