(समानांतर सिनेमा के पुरोधा श्याम बेनेगल का 23 दिसंबर, 2024 को 90 साल की आयु में निधन हो गया। वो पिछले कई सालों से बीमार थे। 14 दिसंबर को ही उन्होंने 90वां जन्मदिवस मनाया था। इस दौरान दिग्गज कलाकार जुटे थे और उन्हें शुभकामनाएं दी थीं लेकिन किसे पता था कि चंद दिनों के बाद ही दुखद खबर आएगी और लाखों-करोड़ों साहित्य-सिनेमा प्रेमियों को गमजदा कर देगी। संयोगवश पिक्चर प्लस पत्रिका के नवंबर-दिसंबर, 2024 के अंक में यह बहस रखी गई थी कि सिनेमा की किन हस्तियों को भारत रत्न मिलना चाहिए? वैसे तो यह राय आम-सी है कि श्याम बेनेगल जैसी हस्तियों को यह सम्मान मिलना चाहिए। इसी अंक में श्याम बेनेगल की पुत्री पिआ बेनेगल ने भी वरिष्ठ फिल्म पत्रकार दीप भट्ट के सौजन्य से अपने विचार प्रकट किए थे, जो निम्न प्रकार हैं। पिक्चर प्लस पत्रिका पढ़ने के लिए क्लिक करें।)
मैं उनकी सुपुत्री हूं तो मैं खुद कैसे कहूं कि भारत सरकार उन्हें भारत रत्न अवॉर्ड से नवाजे। यह सच है कि वे वर्तमान में भारतीय फिलमोदयोग के ऐसे सरताज हैं जिन्हें भारत रत्न मिलना चाहिए। उन्होंने भारतीय फिलमोद्योग में सिनेमा के क्षेत्र में असाधारण काम किया है। असाधारण फिल्मों का निर्माण किया है। आप उनकी पहली ही फिल्म अंकुर देखें तो आपको अहसास हो जाएगा कि उन्होंने कितनी अर्थपूर्ण फिल्म बनाई है। फिल्म देखकर आपको महसूस होगा कि उनमें कितने ऊंचे दर्जे का निर्देशकीय कौशल है। फिर भूमिका, आरोहण, निशांत, मंथन, अन्तर्नाद, जुनून, कलयुग, विजेता, हरी भरी, सूरज का सातवां घोड़ा, जुबैदा और अन्य सभी फिल्में कितने आला दर्जे की फिल्में हैं।
भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की किताब डिस्कवरी ऑफ इंडिया पर आधारित उनके दूरदर्शन धारावाहिक भारत एक खोज को देखें तो आपको महसूस होगा कि एक किताब को धारावाहिक के रूप में ढालकर उन्होंने कितने कमाल का काम किया है। इस धारावाहिक का एक एक फ्रेम दर्शनीय है। यह धारावाहिक पिता के लिए किसी चुनौती से कम नहीं था। हजारों साल के इतिहास में जाकर धारावाहिक की एक एक कड़ी का निर्माण किसी रिसर्च वर्क की तरह था। और यह रिसर्च वर्क उनके निर्देशन में उनकी टीम ने कर दिखाया।
मेरे पिता ने सबसे बड़ा जोखिम तो यह लिया कि एक ओर पलायनवादी मसाला फ़िल्मों का बोलबाला तो दूसरी ओर इसके विपरीत जन-शिक्षण की अर्थपूर्ण फिल्मों का निर्माण। यह अत्यंत जोखिम का काम था। इसमें पैसा डूबने के पूरे चांस थे। पर पिता के काम के साथ जनता का एक धड़ा मजबूती से खड़ा रहा और उन्हें ऐसी फिल्में बनाने के लिए निरंतर प्रेरित करता रहा। इसलिए उन्हें फाइनेंस की कभी दिक्कत नहीं रही। उन्होंने कुछ फिल्में ज़रूर एन एफ डीसी के सहयोग से बनाईं पर अधिकांश फिल्में तो अपने बलबूते ही बनाईं। उन पर भरोसा करने वाले फाइनेंसर हमेशा उनके साथ खड़े रहे। उन्होंने अपने अद्भुत सिनेमाई काम के जरिए सिर्फ हिन्दुस्तान में ही नहीं बल्कि अन्तर्राष्ट्रीय जगत में अपनी एक सशक्त पहचान बनाई।
मुझे उनकी सबसे बड़ी खूबी यह लगती है कि उन्होंने बगैर विश्राम किए अनवरत सार्थक फिल्मों का निर्माण किया। ऐसी फिल्में जिन्होंने इस मुल्क की की पीढ़ियों को शिक्षित और संस्कारित करने का काम किया है। वे अपनी फिल्मों के जरिए हमेशा जन-शिक्षण का काम करते रहे। उनके काम का ध्येय कभी बदला नहीं। ज़माने के साथ कदमताल करते हुए उन्होंने हमेशा अर्थपूर्ण फिल्में बनाने का जो बीड़ा उठाया था वे उस पर कायम रहे।
अभी कुछ समय पहले ही उन्होंने भारत सरकार और बांग्लादेश सरकार के सहयोग से बांग्लादेश के संस्थापक शेख़ मुजीबुर्रहमान के जीवन पर आधारित बायोपिक का निर्माण किया जिसे अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर काफ़ी सफलता मिली। अगर आप गौर से देखें तो पिताजी महान फिल्मकार सत्यजीत रे, मृणाल सेन और ऋत्विक घटक की परंपरा के ही फिल्मकार हैं। वे लिविंग लीजेंड हैं। इन दिनों उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं है। लेकिन फिल्म निर्माण की दिशा में वे अभी भी सक्रिय हैं। वे लिविंग लीजेंड हैं। अगर भारत सरकार उन्हें भारत रत्न अवॉर्ड से नवाजती है तो यह उनके काम के प्रति सच्ची ट्रिब्यूट होगी। (पिया बेनेगल कास्ट्यूम डिजाइनर हैं। वरिष्ठ फिल्म पत्रकार दीप भट्ट से बातचीत पर आधारित)
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