शोमैन राज कपूर का कोलकाता शहर से क्या था कनेक्शन? जन्मशताब्दी पर विशेष

Showman Raj Kapoor birth centenary
शोमैन राज कपूर

•जय नारायण प्रसाद*

हिंदी सिनेमा के ‘शोमैन’ कहे जाने वाले अभिनेता राजकपूर का कोलकाता से भी गहरा नाता था। बहुत कम लोग जानते हैं राजकपूर ने एक बांग्ला फिल्म में अभिनय भी किया था। वह इस फिल्म के मुख्य अभिनेता थे। इस बांग्ला फिल्म का नाम था ‘एक दिन रात्रे’ (वन डे इन नाइट, 1956)। बाद में यह बांग्ला फिल्म हिंदी में बनीं ‘जागते रहो’ के नाम से। इस बांग्ला मूवी में पैसा भी राजकपूर ने ही लगाया था। राजकपूर का छुटपन कोलकाता में बीता था और बचपन की पढ़ाई भी महानगर कोलकाता में हुई थीं। 

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जय नारायण प्रसाद

राजकपूर की पैदाइश हालांकि पाकिस्तान के पेशावर में हुई थीं, लेकिन बचपन में ही राजकपूर अपने पिता पृथ्वीराज कपूर के साथ कोलकाता चले आए‌ थे। राजकपूर का जन्म पेशावर में 14 दिसंबर, 1924 को हुआ और मृत्यु 63 साल की उम्र में नई दिल्ली में  2 जून, 1988 को।

यह राजकपूर का जन्म शताब्दी वर्ष भी है। वे आज जीवित रहते, तो सौ साल के हो रहे होते !

राजकपूर सांस की बीमारी से पीड़ित थे।‌ वर्ष 1988 में भारतीय सिनेमा में विशेष योगदान के लिए ‘दादा साहेब फाल्के’ पुरस्कार लेने राजकपूर नई दिल्ली गए थे। पुरस्कार लेने के बाद राजकपूर की काफी तबीयत बिगड़ गई। तब उन्हें फौरन आयुर्विज्ञान चिकित्सा संस्थान में भर्ती कराया गया जहां 2 जून, 1988 को राजकपूर चल बसे।

राजकपूर की पैदाइश पेशावर की उस ऐतिहासिक हवेली में हुई थीं, जो बाजार किस्सा ख्वानी इलाके के ढकी मुन्नवर शाह नामक मुहल्ले में आज भी है। राजकपूर का परिवार मूलतः पंजाबी खत्री है। पहले ‘कपूर परिवार’ पाकिस्तान के पंजाब प्रांत स्थित लायलपुर से ताल्लुक रखता था। बाद में यह पेशावर में बस गया। 

अभिनय की चाह में कोलकाता आए

अभिनय की चाह ने पृथ्वीराज कपूर को पेशावर से कोलकाता खींच लाया था। तब कोलकाता के न्यू थिएटर स्टूडियो में खूब फिल्में बनती थीं। उन दिनों लाहौर और कोलकाता मात्र दो ही ऐसी जगहें थीं, जहां फिल्मों में अभिनय करने वाले आते-जाते थे। पृथ्वीराज कपूर उनमें से एक थे। कोलकाता में रहते हुए पृथ्वीराज कपूर ने न्यू थिएटर में कुछ फिल्में की। बाद में मुंबई की ओर रुख किया। कोलकाता में रहने के दौरान पृथ्वीराज कपूर को बांग्ला जुबान ठीक-ठाक आ गई थीं।

वैसे तो पृथ्वीराज कपूर के कुल पांच बच्चेथे, जिनमें बड़े का नाम राजकपूर (जन्म पेशावर, 1924), दूसरे शम्मी कपूर (जन्म मुंबई, 1931) और तीसरे थे शशि कपूर (जन्म कोलकाता, 1938)। पृथ्वीराज कपूर को एक बेटी भी थीं, जिनका नाम था उर्मिला सियाल। पृथ्वीराज के दो बच्चों की मौत छुटपन में ही हो गई थी।

इनमें एक मात्र शशि कपूर जन्मे कोलकाता में जरूर थे, लेकिन राजकपूर की तरह उनका कोलकाता से रिश्ता बेहद कम रहा। शशि कपूर का जन्म कोलकाता में 18 मार्च, 1938 को हुआ। अभिनेत्री जेनिफर केंडल से शशि कपूर की पहली मुलाकात इसी महानगर कोलकाता में हुई थीं। बाद में जेनिफर, अभिनेता शशि कपूर की पत्नी बनीं। अपने बड़े भाई राजकपूर की दो फिल्मों – ‘आग’ (1948) और ‘आवारा’ (1951) में शशि कपूर ने चाइल्ड एक्टर की भूमिका भी निभाई थीं।

हाजरा रोड क्रासिंग पर निवास

जब पृथ्वीराज कपूर अभिनय करने पेशावर से कोलकाता आए, तो कालीघाट के नजदीक हाजरा रोड क्रासिंग के पास उन्होंने किराए का एक मकान लिया था। हाजरा से वे नियमित टालीगंज जाते थे और कोलकाता के न्यू थिएटर स्टूडियो में बनने वाली फिल्मों में काम करते थे।‌ इसी हाजरा रोड वाले मकान में राजकपूर अपने माता-पिता के साथ रहते थे और नियमित कालीघाट मंदिर जाते थे। साथ में होती थीं उनकी मां। राजकपूर की मां का नाम रामसरनी देवी था। रामसरनी देवी आध्यात्मिक किस्म की महिला थीं और नियमित पूजा-पाठ करती थी।

दो स्कूलों में हुई राजकपूर की पढ़ाई

राजकपूर की शुरुआती शिक्षा कुछ समय के लिए भवानीपुर के ‘मित्रा इंस्टीट्यूशन’ स्कूल में हुई। थोड़े दिनों बाद पृथ्वीराज कपूर ने अपने बेटे यानी राजकपूर को सेंट जेवियर्स स्कूल में दाखिला दिला दिया। सेंट जेवियर्स स्कूल में रहते हुए राजकपूर बांग्ला बोलना सीख गए थे। कहते हैं कि राजकपूर कोलकाता में होने वाली दुर्गा, सरस्वती और दूसरे देवी-देवताओं की पूजाओं में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे। छुट्टी के दिनों में अपने पिता के साथ वह आस-पास के मैदान में हॉकी खेलने भी जाते थे। हॉकी अभिनेता राजकपूर का तब‌ पसंदीदा खेल‌‌ हुआ करता था।

राजकपूर ने की देवकी बसु की ‘इंकलाब’

निर्देशक देवकी बोस ने कोलकाता के न्यू थिएटर स्टुडियो को वर्ष 1932 में ज्वाइन किया। न्यू थिएटर के लिए देवकी बोस ने हिंदी और बांग्ला में काफी फिल्में बनाईं। ऐसी ही उनकी एक हिंदी फिल्म है ‘इंकलाब’ (1935), जिसमें राजकपूर ने बाल कलाकार की भूमिका निभाई थीं। हुआ ऐसा कि जब देवकी बोस अभिनेता पृथ्वीराज कपूर को न्यू थिएटर में आते-जाते देखते, तो उनके साथ एक बच्चा भी होता। यह बच्चा था राजकपूर! तब राजकपूर की उम्र थीं दस वर्ष।

 एक दिन देवकी बोस ने बच्चे के पिता  पृथ्वीराज कपूर से उसके बेटे के बारे में पूछा और पृथ्वीराज कपूर को उससे अपनी एक फिल्म में अभिनय कराने के लिए मनवा लिया। इस तरह बनीं थीं देवकी बोस की फिल्म ‘इकलाब’। असल में देवकी बोस को फिल्म ‘इंकलाब’ में एक बाल कलाकार की जरूरत थी, जिसके लिए आखिर में राजकपूर को चुना गया‌।

 जानकारी के लिए बता दें कि निर्देशक देवकी बोस मूलतः बंगाल में पूर्वी बर्द्धमान जिला के रहने वाले थे। उनका जन्म 25 नवंबर, 1898 में हुआ और निधन कोलकाता में 17 नवंबर, 1971 को। देवकी बोस की बनाई़ फिल्में अब इस देश की धरोहर मानी जाती हैं।

‘लेक इलाके’ की झील में वोटिंग करते थे राज‌कपूर

बहुत कम लोगों को मालूम है राजकपूर को वोटिंग करने का अच्छा-खासा शौक था। कहते हैं कि छुट्टी के दिनों में पिता पृथ्वीराज कपूर के साथ राजकपूर कोलकाता के ‘लेक कालीबाड़ी’ इलाके से थोड़ी दूरी पर स्थित झील में वोटिंग करने अक्सर जाते थे। कभी-कभी छोटे भाई शशि कपूर भी साथ होते और दोनों वोटिंग करते हुए खूब इंज्वॉय करते। मां रामसरनी देवी और पिता पृथ्वीराज कपूर बाहर बैठकर दोनों बेटों की निगरानी करते रहते।

अलीपुर के चिड़ियाखाना भी जाते थे राजकपूर

कोलकाता के ‘लेक कालीबाड़ी’ इलाके में वोटिंग के अलावा राजकपूर को कोलकाता के अलीपुर इलाका स्थित चिड़ियाखाना में भी जाने का काफी शौक था। वहां वे पशु-पक्षियों को निहारते और हाथी पर सवारी करके ही घर लौटते। तब अलीपुर के चिड़ियाखाना में हाथी की पीठ पर बैठा कर दर्शकों को घुमाया जाता था। अब यह सब नहीं होता। बहुत पहले यहां के चिड़ियाखाने में यह बंद हो चुका है।

वर्ष 1947 में निर्देशक केदार शर्मा की एक फिल्म आई थीं ‘नील कमल’, जिसमें राजकपूर का किरदार बड़ा था। इस फिल्म में साथ में थीं अभिनेत्री बेगम पारा और मधुबाला। मेलोड्रामा कहानी वाली ‘नील कमल’ से राजकपूर की धड़क खुल गई थीं। निर्देशक केदार शर्मा ने राजकपूर की अभिनय क्षमता को तभी परख लिया था। राजकपूर के लिए ‘सिनेमा की दुनिया’ अब खुलने लगी गई थीं।

1948 में राजकपूर ने बनाया अपना बैनर

राजकपूर को जब सिनेमा की दुनिया आसान लगने लगीं, तब उन्होंने अपना बैनर ‘आर के फिल्म्स’ बनाया। यह वर्ष था 1948 और इस बैनर तले राजकपूर ने पहली फिल्म बनाई ‘आग’। राजकपूर के साथ नर्गिस और कामिनी कौशल ने इस मूवी में अभिनय किया था। बीते  जमाने की अभिनेत्री कामिनी कौशल अब भी जीवित हैं, वह भी सौ साल की होने वाली हैं।

‘एक दिन रात्रे’ मुख्य अभिनेता राज कपूर

तीन बार राष्ट्रीय पुरस्कार और ग्यारह बार फिल्मफेयर अवार्ड जीतने वाले ‘शोमैन’ राजकपूर ने एक बांग्ला फिल्म ‘एक दिन रात्रे’ (वन‌ डे इन नाइट, 1956) में मुख्य अभिनेता की भूमिका निभाई थीं। यह बांग्ला फिल्म ‘जागते‌‌ रहो’ के नाम से हिंदी में भी बनी थीं, जिसमें राजकपूर की भूमिका ही प्रमुख थीं। राजकपूर  इस बांग्ला फिल्म के निर्माता थे। ‘आर के फिल्म्स’ के बैनर तले बनीं इस बांग्ला फिल्म ‘एक दिन रात्रे’ को चेकोस्लोवाकिया के कार्लोवी वेरी अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में ‘क्रिस्टल ग्लोब अवॉर्ड’ पुरस्कार भी मिला था। एक लाजवाब कथा पर बनीं इस फिल्म की कहानी ख़्वाजा अहमद अब्बास ने लिखी थी।‌ निर्देशन दो लोगों ने दिया था। एक निर्देशक थे शंभू मित्रा और दूसरे थे अमित मैत्रा। सलिल चौधरी ने इस फिल्म का संगीत दिया था और गाने लिखे थे गीतकार शैलेन्द्र और प्रेम धवन ने। पांच गानों वाली इस बांग्ला/हिंदी फिल्म के छायाकार थे रांधू कर्मकार।

राजकपूर अभिनीत यह बांग्ला फिल्म ‘एक दिन रात्रे’ 24 अगस्त, 1956 को रिलीज हुई थीं। कोलकाता के दर्पणा, इंदिरा और प्राची सिनेमा हॉल में ‌यह रिलीज हुई थीं। इस बांग्ला फिल्म के प्रीमियर पर तब राजकपूर कोलकाता आए थे। इस फिल्म में राजकपूर के अलावा छवि विश्वास, पहाड़ी सान्याल, स्मृति रेखा विश्वास, प्रदीप कुमार, काली सरकार और अभिनेता इफ़्तिख़ार ने खास भूमिका निभाई थीं। बाद में इसका हिंदी वर्जन ‘जागते रहो’ भी रिलीज हुआ। इस फिल्म के एकदम आखिरी हिस्से में अभिनेत्री नर्गिस एक कैमियो के रोल में थीं, जिससे यह फिल्म और खास हो गई थी।

अभिनेता राज कपूर वर्ष 1935 से 1988 तक सक्रिय रहे। इस दौरान उन्होंने 74 फिल्मों में अभिनय किया और ग्यारह में अभिनय के साथ निर्देशन। एशिया और यूरोप में राज कपूर को चाहने वाले सबसे ज्यादा ‌रहे। मिडिल ईस्ट, कैरेबियन कंट्री, अफ्रीका और सोवियत संघ में राजकपूर के अनगिनत प्रशंसक थे। उनकी मृत्यु पर सोवियत संघ में वहां के दर्शक रोते हुए मिले थे।

राज कपूर के अभिनय में चार्ली चैप्लिन की छाप थीं।‌ कहते हैं कि राज कपूर मशहूर अभिनेता चैप्लिन से भरपूर प्रभावित थे। ‘आवारा’ (1951) और ‘श्री 420’ (1955) इसका ज्वलंत उदाहरण है। यह भी कहा जाता है कि राज कपूर जब भी अभिनय शुरू करते थे, सबसे पहले चार्ली चैप्लिन की तस्वीर को प्रणाम करते थे। उसके बाद ही उनका अभिनय आरंभ होता था। अभिनय के क्षेत्र में वे चैप्लिन को अपना ‘गुरु’ मानते थे।

प्रीमियर पर कोलकाता बार बार आते रहे

वर्ष 1948 में जब राजकपूर की पहली फिल्म ‘आग’ रिलीज हुई, तो उसे प्रमोट करने के लिए ‘आग’ के प्रीमियर पर वे पहली दफा कोलकाता आए थे। इस फिल्म में राजकपूर और अभिनेत्री नर्गिस ने गजब की भूमिका निभाई थीं।

उसके बाद राजकपूर वर्ष 1951 में फिल्म ‘श्री 420’ के प्रीमियर पर आए थे कोलकाता। फिर ‌वर्ष 1956 में ‘जागते रहो’ के प्रीमियर पर। वर्ष 1964 में फिल्म ‘संगम’ के प्रीमियर पर राजकपूर का कोलकाता आना हुआ, फिर 1970 में ‘मेरा नाम जोकर’ और आखिर में वर्ष 1976 में फिल्म बॉबी’ के प्रीमियर पर।

‘संगम’ में उत्तम कुमार को लेना चाहते थे 

अपनी फिल्म ‘संगम’ (रिलीज 26 जून, 1964) में राजकपूर बांग्ला सिनेमा के महानायक उत्तम कुमार को लेना चाहते थे।‌ त्रिकोणीय प्रेम पर बनीं ‘संगम’ में राजकपूर, राजेंद्र कुमार और वैजयंती माला ने खास भूमिका निभाई थीं। ‘संगम’ में जो किरदार अभिनेता राजेंद्र कुमार ने निभाया था, वहीं भूमिका बांग्ला फिल्मों के महानायक उत्तम कुमार को मिली थीं।‌ पर, अपनी व्यस्तता की वजह से उत्तम कुमार ने राजकपूर को यह भूमिका निभाने से इंकार कर दिया था। हिंदुस्तान ही नहीं लंदन, पेरिस और स्विटजरलैंड में ‘संगम’ खूब चली थीं। 20 लाख रुपए में बनीं ‘संगम’ ने बाक्स आफिस पर 8 करोड़ रुपए कमाए थे। यह राजकपूर की ब्लाकबस्टर मूवी थीं। बाद में ‘संगम’ तमिल, तेलुगु और कन्नड़ भाषाओं में भी बनीं। इसका नाम था ‘स्वप्ना’ (1981)। इसका निर्देशन दसारी नारायण राव ने किया था।

सृष्टिनाथ कपूर बाद में कहलाए राजकपूर

राजकपूर के छुटपन का नाम था सृष्टिनाथ कपूर। सृष्टिनाथ कपूर के नाम से पुकारा जाने वाला पृथ्वीराज कपूर का ‘यह बड़का लाडला’ बाद में राजकपूर कहलाया। यह अभिनेता राजकपूर का जन्म शताब्दी वर्ष भी है जो 14 दिसंबर, 2024 से शुरू हो गया है। • 

*(लेखक सिने अध्येता हैं। कोलकाता में निवास। संपर्क : ई-मेल : [email protected])

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