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डेढ़ दशक में न रंग दे बसंती जैसी फिल्म बनी, न हजारों ख्वाहिशें ऐसी… क्यों भटक रहे युवा फिल्ममेकर्स?

Rang de Basanti

'रंग दे बसंती' फिल्म का एक दृश्य

-अजय ब्रह्मात्मज

रील और शॉर्ट फिल्म की भरमार और बुखार के इस दौर में सबसे आसान काम है वीडियो बनाना और उसे दुनिया से शेयर कर लेना। यही वीडियो जब फीचर फिल्म के तौर पर बनाना हो तो मुश्किलें आन पड़ती हैं। उन मुश्किलों की बातें फिर कभी करेंगे। फिलहाल हम फिल्म इंडस्ट्री में युवा प्रतिभाओं के लिए उपयुक्त संभावनाओं और युवाओं पर केंद्रित फिल्मों के विषय और मुद्दों पर बातें करेंगे।

आज फिल्मों के निर्माण, निर्देशन या किसी और क्षेत्र में प्रतिभा व योग्यता आजमाने के लिए बेहतरीन समय है। तकनीकी सुविधाएं सुलभ और सस्ती हैं। दर्शक और समीक्षक नए विषयों के लिए तैयार हैं। भिन्न आकार-प्रकार के स्क्रीन हाजिर हैं। कैमरे हथेली में आ गए हैं। अगर कोई प्रतिभाशाली और महत्वाकांक्षी युवा फिल्मों में कुछ करना चाहता है तो उसे बस एकाग्रता, लगन, मेधा और नेटवर्क चाहिए। जरूरी नहीं है कि ये चारों अर्हताएं इसी क्रम में हों। इन चारों का संयोग भी आवश्यक नहीं है। सबसे बड़ी शर्त या आवश्यकता है इच्छाशक्ति।

सिर्फ हिंदी फिल्मों के परिदृश्य पर ही ध्यान दें तो हर साल कुछ नई प्रतिभाएं फिल्मों के विभिन्न क्षेत्रों में दस्तक देती हैं। फिल्मों में बाहर से आई प्रतिभाओं (आउटसाइडर) की पहली कोशिश एक्टिंग की रहती है। कुछ शुरू से डायरेक्शन के बारे में सोच कर आते हैं। लेखक तो हर उत्तर भारतीय होता है, क्योंकि वह हिंदी में लिख सकता है। कुछ कहानियां उसने पढ़ रखी होती हैं और कुछ कहानियां उसके पास होती हैं। कहते हैं ना हर व्यक्ति के पास ढाई फिल्मों की कहानी होती हैं। मुश्किल यह है कि फिल्म इंडस्ट्री और फिल्म बाजार की रुचि उन कहानियों में नहीं होती है। निजी तौर पर हर लेखक के लिए उसकी कहानी रोचक और फिल्म के योग्य होती है। दिक्कत यही है कि अधिकांश महत्वाकांक्षी युवा लेखक स्थितियों और घटनाओं को कहानी मान बैठते हैं। स्थितियों और कहानियों में फर्क होता है। फिल्में कहानियों पर बनती हैं। स्थितियां उस कहानी में दृश्य और प्रसंग बनकर आती हैं।

हिंदी फिल्मों में कुछ करने और जगह बनाने की आकांक्षी प्रतिभाएं अपनी योग्यता, क्षमता और संसाधन को आंक कर प्रयास करें तो निष्फल नहीं हो सकतीं। समस्या तब आती है, जब पहले ही प्रयास में नयी प्रतिभाएं स्थापित प्रतिभाओं के समकक्ष पहुंचे जाने के भुलावे में रहती हैं। लोकप्रियता एक ऐसा मानदंड है जो सभी को आकर्षित करता है। सभी लोकप्रियता और कामयाबी हासिल करना चाहते हैं। इस कोशिश में अधिकांश पहले ही प्रयास में असफल हो जाते हैं। कारण यह है कि वे इधर-उधर से पैसे जमा कर फिल्म शुरू तो कर देते हैं लेकिन उसे अंतिम स्वरूप तक ले जाने में असमर्थ होते हैं। फिल्म निर्माण के व्यवधानों को भी झेल नहीं पाते। आदि ऐसी आधी-अधूरी तैयारी और कोशिश कुछ समय के बाद रुकती, ठहरती और फिर बंद हो जाती है।

शुरू से मैं यही कहता रहा हूं कि किसी भी दौड़ की शुरुआत पहले कदम से होती है। बिल्कुल आवश्यक नहीं है कि वह पहला कदम मुंबई या किसी और फिल्म इंडस्ट्री की नगरी में हो। कुछ दशकों पहले तक फिल्मों के निर्माण नगरों में आना जरूरी था। आप मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, हैदराबाद आकर ही अपने सपने पूरे कर पाते थे। इन शहरों में आकर स्टूडियो, प्रोडक्शन हाउस और डायरेक्टर के करीब पहुंचने और काम पाने के लंबे संघर्ष होते थे। कुछ प्रतिभाओं को कामयाबी मिल पाती थी और ज्यादातर हाथ मलते हुए थके पांव से या तो लौट जाते थे या फिर इन शहरों की भीड़ में गुम हो जाते थे। युवा ही हर भाषा में फिल्मों को गति और दिशा देते हैं। फिल्मों की दुनिया भी बाहरी दुनिया की तरह प्रेरणा, प्रभाव और  प्रयासों की मिली-जुली प्रक्रिया से चलती है। हर नई युवा प्रतिभा गतिमान धारा से जुड़ती है। पहले से चली आ रही गति को अपनाती है और फिर अपनी विशिष्ट प्रतिभा के प्रदर्शन से इंडस्ट्री को नई गति और दिशा देती है।

इन दोनों युवा फिल्मकार अपनी तैयारी देश के विभिन्न शहरों में कर रहे हैं। वे मित्रों, परिजनों और परिचितों के सहयोग से कदम बढ़ाते हैं। किसी युवा फिल्मकार के सपने और सामर्थ्य के आकलन के बाद ही उसकी योजनाओं में निवेश किया जाता है। यह युवा फिल्मकारों के दम-खम पर निर्भर करता है कि वे कैसे और किस प्रकार से अपनी फिल्मों के लिए दूसरों को तैयार कर पाते हैं? फिल्म निर्माण एक अंधी बाजी है। यहां ताश के खेल की तरह ज्यादातर लोग ब्लाइंड खेल रहे होते हैं। यही कारण है कि ऐसी अनगढ़ प्रतिभाओं में से कुछ ही कामयाबी हासिल कर पाती हैं। अब तो फिल्म निर्माण की बारीकियां इंटरनेट और दूसरे माध्यमों से भी सीखी जा सकती हैं। 

‘हजारों ख्वाहिशें ऐसी’ का एक दृश्य

पहले किसी निर्देशक के साथ जुड़ना या अभ्यास व संघर्ष करना लाजिमी था। फिल्म निर्माण से संबंधित प्रशिक्षण संस्थान नहीं थे, इसलिए काम करते हुए ही तकनीकी जानकारियां हासिल होती थीं। अब तकनीकी क्षेत्र में किसी संस्थान से स्नातक होकर आने पर काम तो मिल ही जाता है। फिल्म निर्माण के तकनीकी विभागों में प्रवेश अपेक्षाकृत आसान है। युवा महत्वाकांक्षियों के लिए असली मारामारी अभिनय और निर्देशन में पांव टिकाने और जगह बनाने की होती है।

युवा प्रतिभाओं के फिल्म निर्माण के अन्य विभागों के बारे में अल्प जानकारी रहने की वजह से वह सोच और जान ही नहीं पाते। फिल्मों में प्रवेश करने का मतलब सिर्फ एक्टिंग या डायरेक्शन ही नहीं है। फिल्म निर्माण एक साथ टेक्निकल और क्रिएटिव प्रक्रिया है। ट्रेनिंग से फिल्म निर्माण की अन्य गतिविधियों में स्नातक और पारंगत हुआ जा सकता है। सिनेमैटोग्राफी, एडिटिंग, सेट डिजाइन, कॉस्ट्यूम, म्यूजिक, एक्शन, प्रोडक्शन आदि विभागों में नई युवा प्रतिभाओं की मांग रहती है। छोटे शहरों और कस्बों की प्रतिभाओं को उनकी जानकारी ही नहीं मिल पाती। मीडिया और अन्य संस्थान इस संदर्भ में कुछ भी नहीं लिखने और बताते। सच्चाई यही है कि फिल्म इंडस्ट्री एक ऐसा उद्योग है, जिसमें हर विभाग में नई युवा प्रतिभाओं की जरूरत बनी रहती है। यह भी सच है कि फिल्म निर्माण के किसी विभाग से जुड़ी प्रतिभा का अंतिम लक्ष्य निर्माता या निर्देशक बनना ही होता है। इस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए धैर्य, लगन, परिश्रम और प्रतिभा की जरूरत पड़ती है।

अब रही बात युवा मुद्दों पर फिल्म बनाने की तो हम देख रहे हैं कि अधिकांश जरुरी मुद्दे फिल्मों के विषय से गायब हैं। इस दौर की फिल्में देखकर कोई कह नहीं सकता कि देश के युवा बेकार और बेरोजगार हैं। वे हताश और निराशा में आत्महत्याएं कर रहे हैं। पर्यावरण और पारिस्थितिकी ने उनके लिए जहरीला भविष्य तैयार किया है। देश के युवा समाज के जिन परतों में रहते और बसते हैं वहां तक तो हिंदी फिल्में पहुंच ही नहीं पाती हैं। धीरे-धीरे हिंदी फिल्मों ने एक अभिजात्य स्वरूप हासिल कर लिया है और वह बहुत हद तक शहरी हो गया है। नतीजतन गांव कस्बे बड़े और छोटे शहरों की बातें एवं समस्याएं फिल्मों में आ ही नहीं पाती हैं। बड़े और छोटे शहरों पर केंद्रित फिल्मों को गौर से देखें तो पाएंगे कि इनके नायक और नायिकाए अपने मिजाज और हरकत में किसी महानगर के ही प्रतीत होते हैं। फिल्म के सहयोगी किरदारों से उनका कोई तालमेल नहीं होता है। कभी-कभार कोई ऐसी फिल्म आ जाती है जिसमें इन छोटे शहरों की धड़कनें महसूस की जा सकती हैं। पिछले डेढ़ दशक में ‘हजारों ख्वाहिशें ऐसी’ और ‘रंग दे बसंती’ जैसी फिल्में नहीं आई हैं। युवा फिल्मों के नाम पर हमें ‘खो गए हम कहां’ जैसी फ़िल्में पड़ोसी जा रही हैं। इस फिल्म की समस्या वास्तव में संपन्न और अघाए युवक-युवतियों की है। कुछ फिल्मों में रिश्तों की जटिलताओं और उलझनों को सुलझाने में लेखक-निर्देशक और ज्यादा पेंचिदगियां पैदा कर देते हैं। हिंदी फिल्में देखते हुए यूं लगता है कि हम किसी मनोरमवादी में घूम रहे हैं और वहां सभी के सभी आनंदमग्न है या फिर आनंद की तलाश में हैं। देश की कठोर और विकट सच्चाई हम सभी जानते हैं। हिंदी फिल्मों के लेखक और निर्देशक भी जानते हैं। अभी तो एक अंकुश या आसन्न संकट यह भी है कि आपकी फिल्म किसी भी तरह से असंतुष्टि विक्षोभ या विरोध जाहिर न करे। अन्यथा सत्ता के नुमाइंदे नाराज हो सकते हैं और आप मुश्किलों में फंस सकते हैं। • (लेखक प्रसिद्ध फिल्म समीक्षक, अनुवादक और यूट्यूबर हैं। सिनेमा पर कई पुस्तकें लिखी हैं। मुंबई में निवास। )

(संपर्क–urgenthaikya@gmail.com / cinemahaul@gmail.com https://youtube.com/@ CineMahaul 

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